झूठ के दम पर भला कब तक चलेगा, संजीव जैन
लेखक- संजीव जैन
कह रहा प्रतिपक्ष—दावे हैं किताबी,
कह रहा है पक्ष—सब कुछ है गुलाबी।
लिख रहे अख़बार—डंका बज रहा है,
हर दिशा में मुल्क आगे बढ़ रहा है।
ज़िंदगी मायूस देती है दिखाई,
और शेयर सीढ़ियाँ भी चढ़ रहा है।
अफ़रातफ़री मच रही बाज़ार में अब,
सुल्तान के तेवर अभी भी हैं नवाबी।
ये तरक़्क़ी आँकड़ों का खेल है क्या,
विकास के दावे सभी बेमेल हैं क्या?
सच छिपाया जा रहा है जानकर भी,
पटरियों से यूँ ही लड़ती रेल है क्या?
बिक चुकी हैं संस्थाएँ देश में क्या,
या पीढ़ियाँ ही हो चुकी हैं सब शराबी?
हर तरफ़ हड़ताल देती हैं दिखाई,
जनता अब कंगाल देती हैं दिखाई।
फैला रहे हैं भ्रम सत्ता के दुलारे,
जिंदगी बदहाल देती हैं दिखाई।
प्रश्न टाले जा रहे हैं अब निरंतर,
या कार्रवाई हो रही है कुछ जवाबी?
हालात क्या हैं जानने का हक़ हमें है,
मुल्क को सँभालने का हक़ हमें है।
सच बताएँ रहनुमा अवाम को भी,
सत्य को पहचानने का हक़ हमें है।
झूठ के दम पर भला कब तक चलेगा,
सच से बचकर कब मिली है कामयाबी।
आँख मूँदने से सच्चाई नहीं टलेगी,
स्वयं मशालें परिवर्तन की नहीं जलेंगी।
हम भारत के लोग सँभालें लोकतंत्र को,
सत्ता की मनमानी वरना नहीं थमेगी।
धैर्य, हौसला और एकता ही कुंजी है,
काम नहीं आएगी बिल्कुल भी बेताबी।
