जननायक सूर्यनंदन ठाकुर : इतिहास के पन्नों से लौटती मिथिला की एक महान विभूति

 जननायक सूर्यनंदन ठाकुर : इतिहास के पन्नों से लौटती मिथिला की एक महान विभूति

Political Trust Magazine

स्वतंत्रता संग्राम, लोकतंत्र और जनसेवा के ऐसे पुरोधा जिन्हें इतिहास ने भुला दिया

पवन ठाकुर ‘बमबम’

“कुछ व्यक्तित्व इतिहास नहीं लिखते, वे स्वयं इतिहास बन जाते हैं। किंतु समय की धूल कई बार ऐसे महान व्यक्तित्वों को भी ढक देती है। उन्हें फिर से प्रकाश में लाना इतिहास के प्रति हमारा दायित्व है।”

मिथिला की पावन धरती ने अनेक विद्वानों, साहित्यकारों, स्वतंत्रता सेनानियों और जननेताओं को जन्म दिया है। इन्हीं विभूतियों में एक नाम है स्वर्गीय जननायक सूर्यनंदन ठाकुर का, जिनका जन्म 1 फ़रवरी 1900 को दरभंगा (वर्तमान) के ऐतिहासिक ग्राम सिंहवाड़ा में हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय हरिनन्दन ठाकुर धर्मनिष्ठ, समाजसेवी और लोककल्याणकारी विचारों वाले व्यक्ति थे, जबकि माता बौबी देवी ने उन्हें सेवा, त्याग और राष्ट्रभक्ति के संस्कार दिए।

यह वह समय था जब भारत अंग्रेज़ी शासन की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था और देश के कोने-कोने में स्वतंत्रता की चेतना जाग रही थी। युवा सूर्यनंदन ठाकुर ने भी अपने जीवन का लक्ष्य राष्ट्रसेवा को बनाया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़कर स्वतंत्रता आंदोलन तथा जनजागरण में सक्रिय भूमिका निभाई।

वर्ष 1937 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत हुए पहले प्रांतीय चुनाव में सूर्यनंदन ठाकुर East Madhubani-cum-Bahera General Rural निर्वाचन क्षेत्र से बिहार विधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए। यह केवल उनकी व्यक्तिगत विजय नहीं थी, बल्कि मिथिला के किसानों, ग्रामीण समाज और आम जनता की आकांक्षाओं की जीत थी।

बिहार विधानसभा की कार्यवाहियाँ प्रमाणित करती हैं कि उन्होंने किसानों के अधिकार, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और जनहित के अनेक विषयों को सदन में मुखरता से उठाया। उनके लिए राजनीति पद प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा का संकल्प थी।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में सिंहवाड़ा स्थित उनका आवास राष्ट्रीय चेतना का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। स्थानीय जनश्रुतियों और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार, देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद, बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (श्री बाबू) तथा उस समय के अनेक कांग्रेस नेता और स्वतंत्रता सेनानी समय-समय पर उनसे मिलने सिंहवाड़ा आते थे। वहाँ स्वतंत्रता आंदोलन, ग्रामीण जागरण और संगठन को लेकर विचार-विमर्श होता था। ये स्मृतियाँ आज भी स्थानीय समाज में सम्मानपूर्वक सुनाई जाती हैं और उस दौर की राजनीतिक सक्रियता का संकेत देती हैं।

सूर्यनंदन ठाकुर केवल राजनेता नहीं थे। वे मिथिला की भाषा, संस्कृति और सामाजिक चेतना के भी समर्थक थे। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों में उनका उल्लेख कांग्रेस संगठन और मैथिली भाषा के संरक्षण से जुड़े प्रयासों के संदर्भ में भी मिलता है। क्षेत्र के विकास, सड़क निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य और खादी ग्रामोद्योग को बढ़ावा देने में उनके योगदान को आज भी लोग सम्मान के साथ याद करते हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उनका स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हुआ। दोनों पैरों के अस्वस्थ हो जाने के कारण वे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। इसके बावजूद समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता जीवन के अंतिम क्षण तक बनी रही। 27 मार्च 1956 को यह महान जनसेवक इस संसार से विदा हो गया, किंतु उनके विचार और आदर्श आज भी प्रेरणा देते हैं।

आज विडंबना यह है कि बिहार के प्रारंभिक लोकतांत्रिक इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले इस जननायक का नाम सार्वजनिक स्मृति में अपेक्षित स्थान नहीं पा सका है। इतिहास का यह मौन अध्याय अब पुनः पढ़े जाने की प्रतीक्षा कर रहा है।

इसी उद्देश्य से आज उनकी स्मृति को चिरस्थायी सम्मान दिलाने के लिए व्यापक जनअभियान चलाया जा रहा है। यह अभियान केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि मिथिला के इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम और लोकतांत्रिक विरासत को उसका उचित स्थान दिलाने का प्रयास है।

जननायक सूर्यनंदन ठाकुर का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व सत्ता से नहीं, बल्कि सेवा, संघर्ष, ईमानदारी और जनता के विश्वास से जन्म लेता है। ऐसे व्यक्तित्व कभी इतिहास से मिटते नहीं, केवल उन्हें फिर से खोजने की आवश्यकता होती है।http://Politicaltrust.in