मैं खुद को पहचान सका कुछ- संजीव जैन
लेखक-संजीव जैन
एक दिन खुद को प्रणाम किया तो,
खुद का जब सम्मान किया तो,
बातें कीं जब खुलकर मन से,
खुद से ही संवाद किया तो।
भीतर के सच को जान सका कुछ,
मैं खुद को पहचान सका कुछ।
अंतर्मन के भीतर-बाहर,
जाने कब से भटक रहा हूँ।
असमंजस के शीर्ष पे उल्टा,
जाने कब से लटक रहा हूँ।
गति को जब विराम दिया तो,
और शून्य को नाम दिया तो,
स्वयं की शक्ति जान सका कुछ,
मैं खुद को पहचान सका कुछ।
मुक्ति की आदिम अभिलाषा,
संकुचित-सी एक परिभाषा,
स्वप्न और सत्य में दूरी,
रोज़ टूटती मन की आशा।
मौन का जब अनुवाद किया तो,
और खुलकर विवाद किया तो,
स्वयं की शक्ति जान सका कुछ,
मैं खुद को पहचान सका कुछ।
जड़ता भी प्रयास बन गई,
चिंता भी विश्वास बन गई।
स्वयं की नज़रों से परखा तो,
कुंठा भी उल्लास बन गई।
चित्त को जब आज़ाद किया तो,
अपना परिचय याद किया तो।
स्वयं की शक्ति जान सका कुछ,
मैं ख़ुद को पहचान सका कुछ।
http://Politicaltrust.in
