पानी क्या समझता- संजीव जैन
लेखक -संजीव जैन
किसी की बात पानी क्या समझता,
प्यास की जात पानी क्या समझता।
सहरा तप रहे हैं धूप में पर,
यहाँ बरसात पानी क्या समझता।
ख़ुशी और ग़म में छलकता आँख से वो,
मगर जज़्बात पानी क्या समझता।
कुएँ ने डूबते देखे हज़ारों,
वक़्त-हालात पानी क्या समझता।
बर्फ़ को चूमकर बोलें उजाले,
ठिठुरती रात पानी क्या समझता।
पसीने के समंदर कुछ भी समझें,
मगर औक़ात पानी क्या समझता।
साहिल थक गए हैं चाल चलकर,
शह और मात पानी क्या समझता।
