राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करती कृत्रिम मेधा – प्रो. हरीश सेठी

 राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करती कृत्रिम मेधा – प्रो. हरीश सेठी

प्रो. रवि शर्मा ‘मधुप’

नई दिल्ली –नव उन्नयन साहित्यिक सोसाइटी द्वारा द्विमासिक व्याख्यान माला की शृंखला में ‘कृत्रिम मेधा, हिंदी और अनुवाद : चुनौतियाँ तथा संभावनाएँ’ विषय पर प्रो. हरीश कुमार सेठी ने अपना वक्तव्य दिया। प्रो. हरीश सेठी ने कृत्रिम मेधा के व्यापक प्रयोग-अनुप्रयोग की चर्चा करते हुए मानव जीवन को सरल बनाने में कृत्रिम मेधा के बहुत से उपकरणों का उल्लेख किया। कृत्रिम प्रज्ञा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे नामों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अभी तक इसके लिए कोई मानक शब्द तय नहीं किया गया है। प्रो. सेठी ने बताया कि कृत्रिम मेधा का मूल मंतव्य मानव जीवन को सरल-सहज बनाना है।
कृत्रिम मेधा के ऐतिहासिक पक्ष पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि अमेरिकी वैज्ञानिक ने 1955 में इस शब्द का सबसे पहले उल्लेख किया था। इसके बाद 1956 में एक सेमिनार में कृत्रिम मेधा पर चर्चा हुई। उन्होंने यह भी बताया कि यह अंतर अनुशासनिक (इंटर डिसीप्लिनरी) विषय है। मानव जीवन से जुड़े सभी क्षेत्रों जैसे कृषि, शिक्षा, मनोरंजन, स्वास्थ्य सुविधाएँ आदि में कृत्रिम मेधा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसका मूल आधार प्राकृतिक भाषा संरक्षण (नेचुरल लैंग्वेज प्रोटेक्शन) है और उसमें संचार का माध्यम भाषा बनती है।
मशीनी भाषा में अंग्रेजी भाषा को लेकर पूर्वाग्रह की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मशीन की भाषा बाइनरी भाषा होती है, इसलिए वह किसी विशेष भाषा के माध्यम से कार्य नहीं करती बल्कि बाइनरी डिजिट्स की सहायता से कार्य करती है। प्रो. सेठी ने कहा, “कृत्रिम मेधा का कार्य भाषा के बिना संभव नहीं है, भाषा के माध्यम से ही कृत्रिम मेधा का सार्थक प्रयोग किया जा सकता है।”

उन्होंने यह भी बताया कि यह आज विद्यार्थी, शोधार्थी, शिक्षक, कार्यालय कार्मिक आदि चैट.जी.पी.टी., क्लाउड, जैमिनी, रिज्यूमर, ग्रामरली आदि कृत्रिम मेधा उपकरणों के माध्यम से अपने कार्य को सुचारू रूप से कर रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने कृत्रिम मेधा की चुनौतियों की ओर भी संकेत किया| कृत्रिम मेधा की सामग्री में संवेदनाएँ और भावनाएँ कम होती हैं, साहित्यिक चोरी, मौलिकता का प्रश्न, सांस्कृतिक संदर्भ, बौद्धिक संपदा का अधिकार, डेटा सुरक्षा की चिंता, रोज़गार पर संकट, नैतिक मूल्यों का ह्रास आदि चुनौतियों हैं।
कृत्रिम मेधा के माध्यम से हिंदी भाषा के वैश्विक प्रचार-प्रसार की भी चर्चा करते हुए, उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा-भाषी या अन्य भारतीय भाषाओं के लोगों को भी यह निकट ला रही है, जिससे राष्ट्रीय एकता सुदृढ़ हो रही है। उन्होंने यह भी बताया कि कृत्रिम मेधा के बढ़ते विकास के कारण अनुवाद जैसा कठिन कार्य आज अनुवादक के लिए कम समय में संभव है, इसके कई उपकरण जैसे अनुवादिनी, भाषिनी, शिवा, शक्ति, गूगल ट्रांसलेटर इत्यादि हैं।
कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. पूजा ने किया। कार्यक्रम के समापन में संस्था के अध्यक्ष आदरणीय प्रो. पूरनचंद टंडन जी ने विषय की महत्ता, कृत्रिम मेधा की भूमिका और इसके प्रभावों के प्रति सचेत करते हुए सबको आशीर्वचन दिया। कार्यक्रम में प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की अच्छी संख्या रही। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. हरकेश ने किया।http://Politicaltrust.in