रेड कॉरिडोर से विकास कॉरिडोर तक बदला उग्रवाद का भूगोल

 रेड कॉरिडोर से विकास कॉरिडोर तक बदला उग्रवाद का भूगोल
रायपुर। देश के कभी बेहद अस्थिर रहे “रेड कॉरिडोर में अब वामपंथी उग्रवाद की भौगोलिक पकड़ तेज़ी से सिमटी है। हिंसा घटी है और राज्य उन इलाकों तक पहुंचा है, जहां कभी उसकी मौजूदगी बेहद सीमित थी। इस बदलाव की वजह सिर्फ हथियारों की ताकत नहीं है, बल्कि एक ऐसी विकास रणनीति का लगातार इस्तेमाल है, जिसने उग्रवाद की आर्थिक और राजनीतिक जमीन को बदल दिया है।
2010 में चरम पर माओवादी हिंसा
अपने चरम पर, साल 2010 में माओवादी हिंसा में हर साल 1,100 से अधिक लोगों की मौत होती थी। आज संघर्ष के पैमाने और तीव्रता, दोनों में तेज गिरावट आई है, जबकि प्रभावित जिलों की संख्या 2013 के 126 से घटकर 2024 में सिर्फ 38 रह गई है। यह गिरावट उन क्षेत्रों में एक संरचनात्मक बदलाव को दिखाती है, जहां कभी उग्रवाद अलगाव, गरीबी और राज्य की गैरमौजूदगी के सहारे फलता-फूलता था।
ओआरएफ की एक हालिया स्पेशल रिपोर्ट, जिसका संपादन निरंजन साहू और अम्बर कुमार घोष ने किया है, बताती है कि माओवादी प्रभाव सबसे ज्यादा उन इलाकों में बढ़ा, जहां गहरी वंचना के साथ प्रशासनिक मौजूदगी कमजोर थी। तीखी बदहाली और बेहद सीमित शासन व्यवस्था ने उग्रवादियों को समानांतर सत्ता संरचना खड़ी करने का मौका दिया। बीते एक दशक में भारत की रणनीति में जो निर्णायक बदलाव आया, वह इस समझ पर आधारित था कि एल.डब्ल्यू.ई. की जड़ दरअसल विकास की विफलता में है। भारत की प्रतिक्रिया धीरे-धीरे एक ऐसे हाइब्रिड मॉडल में बदली, जिसमें विकास अर्थशास्त्र और सुरक्षा रणनीति को साथ जोड़ा गया। टिकाऊ शांति के लिए राज्य क्षमता और आर्थिक संभावना, दोनों का विस्तार जरूरी था।
यह रणनीति तीन मुख्य स्तंभों पर आधारित रही। पहला, सड़क, दूरसंचार, वित्त और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में समन्वित सार्वजनिक निवेश उन समन्वय खाइयों को भरता है, जो पिछड़े इलाकों को लगातार कम विकास के जाल में फंसा देती हैं। दूसरा, बाजार की विफलताओं को ठीक करने में राज्य क्षमता की भूमिका। जिन जगहों पर जोखिम और दूर-दराज़ होने की वजह से निजी निवेश नहीं पहुंचता, वहां राज्य ने बुनियादी ढांचे और संस्थानों में मुख्य निवेशक की भूमिका निभाई। तीसरा, पिछड़े इलाकों को राष्ट्रीय बाजारों से जोड़ना, ताकि असमानता घटे और संघर्ष की आर्थिक बुनियाद कमजोर पड़े। इसके बाद जो नीति बनी, उसने दमनकारी क्षमता को सार्वजनिक सुविधाओं के लगातार विस्तार के साथ जोड़ा।
इस बदलाव की सबसे साफ तस्वीर भौतिक कनेक्टिविटी में दिखती है। सड़क निर्माण ने उन इलाकों में दूरी और समय, दोनों को घटा दिया है, जो पहले लगभग कटे हुए थे। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, बस्तर संभाग में नारायणपुर-दान्तेवाड़ा-जगरगुंडा कॉरिडोर पर यात्रा दूरी 295 किलोमीटर से घटकर 201 किलोमीटर रह गई है, जबकि सफर का समय लगभग 10 घंटे से कम होकर 5 घंटे से नीचे आ गया है। इसी तरह बीजापुर-पामेड़ मार्ग 250 किलोमीटर से घटकर 110 किलोमीटर रह गया है, जिससे यात्रा समय लगभग आधा हो गया है। ये बदलाव सिर्फ भौतिक सुविधा नहीं हैं, बल्कि “आर्थिक दूरी” में एक बुनियादी कमी को दिखाते हैं। इससे लेन-देन की लागत घटती है, श्रम गतिशीलता बढ़ती है और स्थानीय अर्थव्यवस्थाएं बड़े बाजारों से जुड़ती हैं। दूरसंचार विस्तार ने इस बदलाव को और मजबूत किया है। सूत्रों के अनुसार, सिर्फ बस्तर में 2021 तक 3,244 गांवों को कवर करने वाले 581 मोबाइल टावर थे, जबकि अब नेटवर्क तेजी से घना हुआ है। 2024-25 में 700 से ज्यादा नए टावर लगाए गए हैं और सैकड़ों टावरों को 2जी से 4जी में अपग्रेड किया गया है। सीमित कनेक्टिविटी से लगभग संतृप्त नेटवर्क तक का यह सफर बहुत गहरे असर वाला है। इससे डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर संभव होते हैं, वित्तीय समावेशन बढ़ता है और वह सूचना एकाधिकार टूटता है, जिस पर कभी उग्रवादी समूह टिके रहते थे।