कल दिल्ली ठप रहेगी?
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन से पहले सरकार की जबरदस्त तैयारी
Nimmi Thakur
नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कल होने वाले प्रदर्शन से पहले दिल्ली में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए जा रहे हैं। सरकार की तैयारियों को देखकर सवाल उठता है कि आखिर प्रशासन को किस तरह के प्रदर्शन की आशंका है और इसे रोकने के लिए इतनी बड़ी तैयारी क्यों की जा रही है?
निश्चित रूप से सरकार के पास कुछ इनपुट होंगे और ये इनपुट आज ही नहीं मिले होंगे। जब से काकरोच जनता पार्टी ने जंतर-मंतर पर आकर फिर से प्रदर्शन करने की बात कही थी, तभी से सरकार इस आंदोलन को लेकर सतर्क हो गई थी। पिछले प्रदर्शन में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेने में सफलता मिलने के बाद काकरोच जनता पार्टी का हौसला बढ़ा है। सरकार को यह सूचना मिली है कि इस बार का प्रदर्शन काफी बड़ा हो सकता है।
इस प्रदर्शन की खास बात यह है कि इसमें कोई राजनीतिक दल सीधे तौर पर शामिल नहीं है। इसे जेन-जी, मिलेनियल और जेन-अल्फा पीढ़ी के युवाओं से जोड़कर देखा जा रहा है। यदि बड़ी संख्या में बच्चे और युवा सड़कों पर उतरते हैं और उन्हें रोकने के लिए बल प्रयोग किया जाता है, तो सरकार को फिर आलोचनाओं का सामना करना पड़ सकता है। पिछले प्रदर्शन के दौरान भी सरकार की काफी फजीहत हुई थी। प्रधानमंत्री ने भावुक संबोधन किया था और पुलिस से बच्चों के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने की अपील भी की थी।
लेकिन इस बार मुद्दा अलग है। सरकार को कहीं न कहीं इसके पीछे बड़ी राजनीतिक साजिश दिखाई दे रही है। सवाल उठ रहा है कि इन युवाओं को अचानक लोकतंत्र की रक्षा करने का ख्याल कहां से आया और वे वोट चोरी के मुद्दे से कैसे जुड़ गए? इनमें बहुत से युवा ऐसे भी हो सकते हैं जो अभी मतदाता नहीं बने हैं। जिन लोगों ने मतदान किया भी है, उनमें से कई ने पहली बार वोट दिया होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि चुनाव व्यवस्था को लेकर उनके मन में इतनी बड़ी चिंता क्यों पैदा हुई है?
पिछले छात्र आंदोलनों में पेपर लीक, महंगाई, रोजगार और करियर जैसे मुद्दे प्रमुख थे। ये ऐसे विषय थे जिनका सीधा संबंध बच्चों और उनके परिवारों से था। हर परिवार में किसी न किसी का बच्चा परीक्षा देता है, इसलिए पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था को लेकर लोगों में स्वाभाविक आक्रोश था। जब छात्र सड़कों पर उतरे, तो उन्हें नैतिक समर्थन भी मिला। लेकिन इस बार मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग है, जो सीधे तौर पर छात्रों के करियर से जुड़ा मुद्दा नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार पिछले आंदोलन की तीव्रता को भांपने में चूक गई थी या उसके पास सही जानकारी नहीं थी? जहां तक पिछली छात्र परीक्षाओं और पेपर लीक से जुड़े आंदोलनों की बात है, सरकार के पास इनपुट होने के बावजूद उस समय प्रदर्शन को रोकने के लिए इतनी व्यापक तैयारी नहीं दिखाई दी थी। लेकिन इस बार मामला अलग नजर आ रहा है।
सरकार की तैयारियों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा रहा है कि लगभग 57 ट्रेनों को रद्द किए जाने की जानकारी सामने आई है। बताया जा रहा है कि ये ट्रेनें बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से दिल्ली आती हैं। शनिवार सुबह चार बजे से दोपहर दो बजे तक दिल्ली पहुंचने वाली कुछ ट्रेनों को रद्द किए जाने की बात कही जा रही है। हालांकि, इनकी संख्या और रद्द होने के कारणों की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है।
इसी तरह मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने की चर्चा ने भी सवाल खड़े किए हैं। प्रदर्शन जंतर-मंतर के आसपास होना है, लेकिन यदि दूर-दराज के इलाकों में भी मेट्रो सेवाएं प्रभावित होती हैं, तो इसका असर दिल्ली की सामान्य जिंदगी पर पड़ेगा। पहले भी मंडी हाउस, सेंट्रल सेक्रेटेरियट और राजीव चौक जैसे स्टेशनों पर सुरक्षा कारणों से प्रतिबंध लगाए जाते रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि यदि प्रतिबंध बड़े क्षेत्र में लगाए जा रहे हैं, तो इसकी जरूरत कितनी है?
सरकार को आशंका है कि बड़ी संख्या में लोग मेट्रो के माध्यम से प्रदर्शन स्थल तक पहुंच सकते हैं। इसी वजह से आवाजाही को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है। दिल्ली के बॉर्डर पर सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाए जाने की भी चर्चा है। पिछली बार की तुलना में ढाई गुना अधिक सुरक्षा बल लगाए जाने का दावा किया जा रहा है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।
सड़कों पर भी सुरक्षा व्यवस्था सख्त किए जाने की बात सामने आ रही है। यदि लोगों को आने-जाने में इतनी बाधाएं हों कि वे अपने घरों से बाहर ही न निकल सकें, तो स्थिति कर्फ्यू जैसी हो सकती है, भले ही आधिकारिक रूप से कर्फ्यू घोषित न किया गया हो।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी व्यापक तैयारियों के बावजूद यदि बड़ी संख्या में लोग प्रदर्शन स्थल पर पहुंच जाते हैं, तो सरकार और पुलिस के सामने क्या चुनौती होगी? क्या प्रशासन को प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों की वास्तविक संख्या का अनुमान है? इसका जवाब प्रदर्शन के दिन ही सामने आएगा।
इसके साथ ही यह सवाल भी है कि क्या ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा होगा? एक तरफ युवाओं के नाम पर काकरोच जनता पार्टी प्रदर्शन करने जा रही है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस और विपक्षी दल चुनाव व्यवस्था में कथित अनियमितताओं को लेकर सक्रिय हैं। विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर अपनी बात रखी है। विपक्ष का दावा है कि राष्ट्रपति ने उनकी बातों को खारिज नहीं किया। इसके बाद सोमवार को विपक्षी दलों के मुख्य न्यायाधीश से मिलने की चर्चा है। यदि यह मामला न्यायपालिका के समक्ष भी उठता है, तो आने वाले दिनों में यह बहस और दिलचस्प हो सकती है।
राहुल गांधी के चेन्नई में छात्रों के एक कार्यक्रम को संबोधित करने के बीच दिल्ली में इस प्रदर्शन को लेकर भी राजनीतिक नजरें टिकी रहेंगी। लेकिन यह समझना जरूरी है कि मौजूदा प्रदर्शन केवल छात्रों की शिक्षा या रोजगार से जुड़ी मांगों को लेकर नहीं है, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने और चुनाव व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग को लेकर है।
यदि युवा पीढ़ी यह मानने लगी है कि चुनाव व्यवस्था में सुधार होना चाहिए और उसे मौजूदा व्यवस्था में कुछ खामियां दिखाई दे रही हैं, तो लोकतंत्र के लिहाज से यह एक महत्वपूर्ण संकेत है। चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। हालांकि, किसी भी तरह की हिंसा नहीं होनी चाहिए और शांतिपूर्ण प्रदर्शन को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।
सरकार को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र में विरोध की आवाज को केवल सुरक्षा के नजरिये से नहीं देखा जा सकता। कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर आम जनता की आवाजाही और रोजमर्रा की जिंदगी को अत्यधिक प्रभावित करना भी उचित नहीं होगा।
यदि दिल्ली में मेट्रो, रेल और सड़क यातायात प्रभावित होता है, तो स्कूल, कार्यालय, व्यापारिक गतिविधियां और अस्पताल जाने वाले लोग परेशान होंगे। सवाल यह है कि सरकार ने इन समस्याओं से निपटने के लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था की है? यदि किसी मरीज को अस्पताल जाना है या किसी व्यक्ति को जरूरी काम से बाहर निकलना है, तो वह किस रास्ते से पहुंचेगा? एम्बुलेंस को रास्ता देना जरूरी है, लेकिन आम नागरिकों की परेशानी का समाधान भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।
अब सबकी निगाहें कल होने वाले प्रदर्शन पर टिकी हैं। देखना होगा कि कितने लोग इसमें शामिल होते हैं, प्रशासन की तैयारियां किस तरह काम करती हैं और सरकार इस पूरे मामले को कैसे संभालती है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या सुरक्षा के व्यापक इंतजाम के बीच शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार सुरक्षित रह पाएगा और क्या चुनाव व्यवस्था से जुड़े सवालों का कोई ठोस जवाब सामने आएगा?
