प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय, नई दिल्ली में रूपिंदर बरार के उपन्यास ‘कोरल्स ब्लूम अगेन’ का लोकार्पण!
दिनेश कुमार गौड़
नई दिल्ली- भारत सरकार के कोयला मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव तथा वरिष्ठ भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी रूपिंदर बरार के प्रथम उपन्यास ‘कोरल्स ब्लूम अगेन’ का लोकार्पण आज नई दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय, तीन मूर्ति भवन के सभागार में किया गया।
इस अवसर पर दिल्ली के साहित्यिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक जगत की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों की उपस्थिति रही। सभागार दर्शकों से खचाखच भरा रहा और लेखक, साहित्यकार तथा विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य अतिथि कार्यक्रम में शामिल हुए।
कार्यक्रम में “महिलाएं, पर्यावरण और संघर्ष से उबरने की कला” विषय पर एक विशेष परिचर्चा आयोजित की गई। परिचर्चा में कानून, कूटनीति, साहित्य, खान-पान और पर्यावरण विज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिष्ठित हस्तियों ने भाग लिया और उपन्यास में उठाए गए विषयों पर अपने विचार साझा किए।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा ने लेखिका को बधाई देते हुए कहा कि उन्होंने कथा की भावनात्मक गहराई को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि उपन्यास वास्तविक जीवन के संदर्भों के माध्यम से पर्यावरण के महत्व को प्रभावशाली ढंग से सामने लाता है। झारखंड में महिलाओं के जीवन को करीब से देखने के अपने अनुभव साझा करते हुए न्यायमूर्ति मिश्रा ने महिलाओं की दबाई गई आकांक्षाओं और समाज में उनकी बेहतर भागीदारी की आवश्यकता पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि गंभीर विषयों के बावजूद यह उपन्यास सहज और पठनीय है तथा इसमें भूगोल, सामाजिक एकजुटता, जलवायु परिवर्तन और आदिवासी अधिकार जैसे विषय भी प्रभावी ढंग से उभरते हैं।
आउटलुक की पूर्व संपादक चिंकी सिन्हा के साथ बातचीत में रूपिंदर बरार ने उपन्यास की रचना की पृष्ठभूमि साझा की। उन्होंने बताया कि तंजानिया में बिताए वर्षों ने उन्हें इस कहानी के लिए प्रेरित किया। उन्होंने घायल मछुआरों से संबंधित एक समाचार का उल्लेख करते हुए बताया कि बाद में उन्हें पता चला कि यह घटना ‘ब्लास्ट फिशिंग’ जैसी विनाशकारी मछली पकड़ने की पद्धति से जुड़ी थी। उन्होंने कहा कि ऐसी गतिविधियां केवल पूर्वी अफ्रीका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारत के कुछ हिस्सों, जैसे केरल में भी देखने को मिलती हैं।
रूपिंदर बरार ने उपन्यास के काल्पनिक द्वीप मिजिंगा के प्रति अपने लगाव और कथा को आकार देने के लिए किए गए व्यापक शोध के बारे में भी बताया। उन्होंने कहानी में भारत और पूर्वी अफ्रीका के बीच लंबे समय से चले आ रहे सांस्कृतिक संबंधों को भी रेखांकित किया।
लेखिका प्रत्यक्ष सिन्हा ने उपन्यास की नायिका माया को एक प्रभावशाली और जटिल चरित्र बताया। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास केवल एक पर्यावरण-केंद्रित थ्रिलर नहीं है, बल्कि गहरे नैतिक और मानवीय सवाल भी उठाता है। उनके अनुसार, भारत-अफ्रीका के बहुआयामी संबंधों के बीच माया के चरित्र को स्थापित करना समकालीन महिला लेखन के महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाता है। उन्होंने कहा कि एक अनुभवी नौकरशाह के रूप में रूपिंदर बरार के वर्षों के अनुभव ने कथा को एक अलग तरह की विश्वसनीयता और दृष्टि प्रदान की है।

प्रसिद्ध शेफ रणवीर बरार ने परिचर्चा में एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए रसोई को लैंगिकता और सामाजिक संरचनाओं से प्रभावित स्थान के रूप में देखने तथा भोजन के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण को समझने की बात कही। उन्होंने कहा कि संरक्षण की भावना मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों में शामिल है और कई बार वास्तविक संरक्षण का अर्थ उन टिकाऊ जीवन-पद्धतियों की ओर लौटना भी है, जिन्हें पिछली पीढ़ियां अपनाती थीं। उन्होंने ‘सैंडविच जनरेशन’ का उल्लेख करते हुए ‘मदर अर्थ’ की अवधारणा में निहित देखभाल और संरक्षण की भावना को फिर से समझने की आवश्यकता पर जोर दिया।
एथ्नोबॉटनिस्ट डॉ. अमित कौर पुरी ने दर्शकों से संवाद करते हुए पूछा कि क्या उन्होंने कभी कोरल रीफ देखी है और वास्तव में कोरल क्या हैं—चट्टानें या पौधे? उन्होंने बताया कि कोरल जीवित पॉलीप होते हैं, जो शैवाल के साथ सहजीवी संबंध में रहते हैं। यही संबंध कोरल को उनके विशिष्ट रंग और संरचना प्रदान करता है, जबकि उनकी संरचना कैल्शियम कार्बोनेट से बनती है। उन्होंने दुनिया में कोरल की 6,000 से अधिक प्रजातियों का उल्लेख करते हुए कहा कि अभी भी कई प्रजातियां खोजी जानी बाकी हैं।
डॉ. पुरी ने उपन्यास के केंद्रीय विषय ‘ब्लास्ट फिशिंग’ को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाते हुए बताया कि ऐसी गतिविधियां मछलियों को प्रभावित करने के साथ-साथ कोरल से जुड़े शैवाल को भी नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे कोरल ब्लीचिंग की स्थिति पैदा हो सकती है। उन्होंने सामूहिक सोच में बदलाव के माध्यम से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्जीवन की उम्मीद जताई और लक्षद्वीप, कच्छ के रण तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के कोरल पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण को महत्वपूर्ण बताया।
केन्या उच्चायोग की मंत्री विनी म्वानजाला ने आदिवासी अधिकारों और पूर्वजों से मिली प्रकृति-संरक्षण की परंपराओं पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि पिछली पीढ़ियां जंगलों और प्रकृति के संरक्षण को लेकर गहरी समझ रखती थीं। उन्होंने भारत और अफ्रीका के बीच ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंधों का उल्लेख करते हुए मसाला व्यापार तथा केन्या के तटीय क्षेत्रों में भारतीय समुदायों के बसने का संदर्भ दिया। उन्होंने कहा कि माताओं और दादियों-नानियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिली टिकाऊ जीवन-पद्धतियों को भुलाने के बजाय उन्हें सम्मान और समृद्धि के साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
रूपिंदर बरार ने अपनी रचनात्मक प्रक्रिया पर चर्चा करते हुए कहा कि केन, माया और उपन्यास के अन्य पात्र पिछले दो-तीन वर्षों से उनके साथ रहे हैं और धीरे-धीरे उन्हें वास्तविक जीवन के परिचित लोगों की तरह लगने लगे।
कोनार्क पब्लिशर्स के निदेशक विष्णुकांत रामचंद्रन ने गंभीर और महत्वपूर्ण विषयों पर पुस्तक प्रकाशित करने के जोखिम से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए कहा कि उनके पिता ने भी अपने समय में इसी तरह के जोखिम उठाए थे और कोनार्क पब्लिशर्स हमेशा सार्थक एवं विचारोत्तेजक साहित्य को समर्थन देता रहा है। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से तेजी से बदलते वर्तमान दौर में इस तरह का प्रकाशन और भी प्रासंगिक हो गया है।
कार्यक्रम का समापन एक रोचक प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ, जिसमें दर्शकों ने लेखिका और परिचर्चा में शामिल वक्ताओं से पुस्तक तथा उससे जुड़े विभिन्न विषयों पर सवाल पूछे।
कोनार्क पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित ‘कोरल्स ब्लूम अगेन’ अब अमेजन पर उपलब्ध है।http://Politicaltrust.in
