राम काव्य वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर है – डॉ. करुणा शर्मा

 राम काव्य वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर है – डॉ. करुणा शर्मा

New Delhi –नव उन्नयन साहित्यिक सोसाइटी द्वारा आयोजित ऑनलाइन द्विमासिक हिंदी व्याख्यानमाला के फरवरी सत्र में “वाल्मीकि रामायण और रामकीर्ति (रामाकियन) का तुलनात्मक अध्ययन” विषय पर एक अत्यंत ज्ञानवर्धक व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य भारत और थाईलैंड की सांस्कृतिक परंपराओं में रामकथा के विविध रूपों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करना था। कार्यक्रम का सुगठित संचालन डॉ. मीना पाण्डेय ने किया तथा उन्होंने मुख्य वक्ता वरिष्ठ शिक्षिका एवं प्रतिष्ठित समालोचक डॉ. करुणा शर्मा का औपचारिक परिचय देकर व्याख्यानमाला का शुभारंभ किया।
अपने व्याख्यान के प्रारंभ में डॉ. करुणा शर्मा ने बताया कि रामकीर्ति को थाई भाषा में ‘रामाकियन’ कहा जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यद्यपि वाल्मीकि रामायण और रामकीर्ति की मूल कथा समान है, तथापि दोनों ग्रंथों में पात्रों के चरित्र-चित्रण, घटनाओं की प्रस्तुति, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि तथा दृष्टिकोण में अनेक महत्त्वपूर्ण अंतर दिखाई देते हैं। ‘रामाकियन’ की रचना के संदर्भ में उन्होंने बताया कि थाईलैंड के वर्तमान चक्री वंश के संस्थापक राजा राम प्रथम ने थाई साहित्य और कला परंपराओं के पुनरुत्थान हेतु कवियों को संगठित कर रामकथा का सृजन ‘रामाकियन’ के रूप में कराया। तभी से यह कृति राजा राम प्रथम की ‘रामाकियन’ के रूप में प्रसिद्ध है।
डॉ. शर्मा ने कहा कि ‘रामाकियन’ में राम को नारायण के अधीनस्थ देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है, जबकि सीता को तार्किक, आत्मसम्मानपूर्ण और अन्याय का विरोध करने वाली बुद्धिमती स्त्री के रूप में चित्रित किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में रामायण एक धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित है, जबकि थाईलैंड में ‘रामाकियन’ मुख्यतः साहित्यिक और सांस्कृतिक ग्रंथ के रूप में मान्य है। इसका प्रभाव विशेष रूप से हनुमान के चरित्र-चित्रण, सीता के रसातल में प्रवेश तथा निर्वासन जैसी घटनाओं की भिन्न प्रस्तुति में देखा जा सकता है।
तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते हुए डॉ. करुणा शर्मा ने बताया कि ‘रामाकियन’ का अंत सुखद है, जिसमें राम और सीता का पुनर्मिलन होता है। इस ग्रंथ में नाटकीयता और रंगमंचीय प्रभाव अधिक दिखाई देता है। उनके वक्तव्य का अत्यंत मार्मिक और रोचक पक्ष मृत्यु की ओर अग्रसर थोसाकन (दसकंठ) की बदलती मनःस्थिति का चित्रण था, जिसे उन्होंने राम कीर्तिकार की मौलिक कल्पना बताया। उन्होंने अपने शोधपरक निष्कर्ष में कहा कि थाईलैंड का यह महाकाव्य राम और रामकथा को वैश्विक तथा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में समझने की एक भिन्न और व्यापक दृष्टि प्रदान करता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शिक्षाविद् प्रो. पूरन चंद टंडन ने की। इस अवसर पर नव उन्नयन साहित्यिक सोसाइटी की महासचिव प्रो. विनीता कुमारी सहित अन्य प्राध्यापक और शोधार्थी उपस्थित रहे। अंत में डॉ. रुचि शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।