क्षमा नीरा फाउंडेशन के तीन वर्ष पूर्ण: सांस्कृतिक संध्या में झलकी मिथिला और भारत की बहुरंगी विरासत
नई दिल्ली। समाज के वंचित वर्गों के उत्थान हेतु शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में निरंतर कार्यरत गैर-लाभकारी संस्था क्षमा नीरा फाउंडेशन ने 14 फरवरी को अपने तीन वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया। संस्था की अध्यक्ष नीरा झा के नेतृत्व में आयोजित यह कार्यक्रम सांस्कृतिक समरसता और सामाजिक प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण बनकर उभरा।

पिछले तीन वर्षों से सत्यनिष्ठा और समर्पण के साथ सामाजिक कार्यों में सक्रिय नीरा झा ने इस अवसर को विशेष बनाते हुए भारतीय संस्कृति की विविधता को मंच पर सजीव रूप में प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण मैथिली भाषा और संस्कृति पर आधारित प्रस्तुतियाँ रहीं, जिन्होंने दर्शकों का मन मोह लिया।

विशेष रूप से प्रस्तुत नाटिका “बउवासिन” ने सभी को भावविभोर कर दिया। स्वर्गीय भोलानाथ झा द्वारा लिखित इस नाट्य रचना को कलाकार किरण झा, सुधा झा और तरुण झा ने सशक्त अभिनय के साथ मंचित किया। कलाकारों ने अपने पात्रों को इतनी जीवंतता से प्रस्तुत किया कि दर्शक स्वयं को कथा के साथ जुड़ा हुआ महसूस करने लगे। यह प्रस्तुति इस बात का प्रमाण बनी कि सच्चा कलाकार अपने चरित्र को केवल निभाता नहीं, बल्कि उसे जीता है।

कार्यक्रम की एक और मनमोहक प्रस्तुति रही रश्मि सिंह का नृत्य, जिन्होंने मिथिला की सुप्रसिद्ध गायिका शारदा सिन्हा द्वारा गाए गीत पर अत्यंत सुंदर भाव-नृत्य प्रस्तुत किया। इसके अतिरिक्त रामचंद्र के चरित्र का प्रभावशाली चित्रण भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर गया।

संस्था द्वारा केवल मैथिली संस्कृति ही नहीं, बल्कि भारत के अन्य राज्यों की सांस्कृतिक झलक भी प्रस्तुत की गई। उत्तराखंड, कश्मीर और महाराष्ट्र के लोकनृत्यों को नन्हें कलाकारों ने अत्यंत उत्साह और ऊर्जा के साथ प्रस्तुत कर कार्यक्रम को बहुरंगी स्वरूप प्रदान किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता मानव रहे, जिन्हें उनकी सादगी और गरिमामयी व्यक्तित्व के लिए जाना जाता है। साथ ही सविता शर्मा, निम्मी ठाकुर, इंद्रमोहन, अमरचंद सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ाया।

यह आयोजन न केवल संस्था की तीन वर्षों की उपलब्धियों का उत्सव था, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने की एक सार्थक पहल भी सिद्ध हुआ। बहुरंगी संस्कृतियों से समृद्ध भारत में अपनी जड़ों से जुड़े रहने का यह प्रयास निस्संदेह सराहनीय है।
