प्रसिद्ध उपन्यासकार व नाटककार डॉ. हरि सुमन बिष्ट द्वारा रचित नाटक व उपन्यास का हुआ लोकार्पण व परिचर्चा
सी एम पपनै
नई दिल्ली। चाणक्यपुरी स्थित उत्तराखंड सदन के मुख्य सभाकक्ष में विगत रविवार 18 अक्टूबर को प्रसिद्ध उपन्यासकार व नाटककार डॉ. हरि सुमन बिष्ट द्वारा रचित नाटक व उपन्यास पर परिचर्चा व उनका लोकार्पण आयोजन हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित पत्रकार, कहानीकार, उपन्यासकार व समालोचक पंकज बिष्ट की अध्यक्षता तथा हिंदी साहित्य के प्रमुख साहित्यकारो में प्रमुख महेश दर्पण व प्रताप सहगल, रंगकर्मी व नाट्य निर्देशक क्रमशः डॉ. सुवर्ण रावत व भूपेश जोशी मंचासीनो की प्रभावी उपस्थिति में तथा अन्य अनेकों साहित्यकारों, रंगकर्मियों, पत्रकारों व फिल्मकारों में प्रमुख प्रोफेसर (डॉ.) हरेन्द्र असवाल, जे पी सिंह, प्रताप सिंह, संजय जोशी, डॉ. मीनाक्षी जोशी, कल्पना मनोरमा, सुशीला रावत, अमरचंद, खुशहाल सिंह रावत, चंद्र मोहन पपनै, आकाश जोशी, पवन मैठाणी, भुवन रावत इत्यादि इत्यादि की प्रभावी उपस्थिति में आयोजित किया गया।

आयोजित परिचर्चा व लोकार्पण समारोह का शुभारंभ डॉ. हरि सुमन बिष्ट के व्यक्तित्व, कृतित्व व साहित्य लेखन में दिए गए योगदान पर समाज के प्रमुख प्रबुद्ध जनों के वक्तव्यों पर निर्मित वृत्तचित्र के प्रदर्शन व मंचासीनों के साथ-साथ अन्य प्रमुख साहित्य, रंगकर्म निर्देशन, फिल्म निर्माताओं व पत्रकारों में जे पी सिंह, डॉ. हरेंद्र असवाल, संजय जोशी, डॉ. मीनाक्षी जोशी, प्रताप सिंह, कल्पना मनोरमा इत्यादि इत्यादि का शाल ओढ़ा कर व स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया। मंचासीनो के कर कमलों डॉ. हरि सुमन बिष्ट द्वारा रचित दो पुस्तकों में उपन्यास ‘पुतले’ तथा नाटक ‘सुनता है कौन’ का लोकार्पण किया गया। रचित उपन्यास ‘हवाओं में घिरा आदमी’ तथा नाटक ‘सुनता है कौन’ पर वक्ताओं में प्रमुख भूपेश जोशी द्वारा बीज वक्तव्य तथा डॉ. हरेंद्र असवाल, जे पी सिंह, कल्पना मनोरमा, मीनाक्षी जोशी, प्रताप सिंह, दक्षा उपाध्याय तथा महेश दर्पण के साथ साथ प्रताप सहगल व पंकज बिष्ट द्वारा रचित पुस्तकों पर उनमुक्त होकर बेबाक विचार व्यक्त किए गए।

वक्ताओं द्वारा डॉ. हरि सुमन बिष्ट द्वारा रचित उपन्यास ‘हवाओं में घिरा आदमी’ के बावत परिचर्चा में कहा गया, रचित उपन्यास केवल एक प्रेमकथा ही नहीं, उक्त शीर्षक बड़ा रूप प्रस्तुत करता है, अन्य प्रेम कथाओं से अलग भी करता है। दो देशों भारत और भूटान को जोड़ता है। ये प्रेम की महक लिए हवाए हैं जो नायक को भारत से भूटान तक ले जाती हैं। रचित उपन्यास हमें पंद्रहवीं शताब्दी की याद दिलाता है, नाटक में व्हाट्सएप प्रेम हुआ है। यह समय की वैचारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक हवाओ की अद्भुत कहानी है। हिमालयी और भूटानी संस्कृति का तानाबाना इस उपन्यास में बुना गया है। प्रेमगाथा प्रेरणा देती है, जिसने भी प्रेम किया उसने ही उन देशों को फुलाया फलाया है।

परिचर्चा में कहा गया, लेखक रचित उपन्यास में भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की तारीफ करते नजर आते हैं। देश और विश्व के विकास की सांस्कृतिक परिदृश्य पर पहाड़ में विकास के नाम पर जो आपदाएं आती हैं उसके विरोध में भी लेखक नजर आता है। रचित प्रेमकथा अन्य उद्धरणो को सामने लाने पर कही भटकती नजर नहीं आती है। लेखक आहिस्ता-आहिस्ता किरदारों को बुनते हैं। दर्शन अद्भुत है। लेखन में सघनता है। देश के इर्दगिर्द के सभी पड़ोसी मुल्कों के पहाड़ी अंचल के जनजीवन के अनुभव को उपन्यास में जोड़ा गया है साहसिक उपन्यास है। विभिन्न विषयों का उपन्यास में अध्ययन है। भाषा का उपन्यास में बड़ा रोल है। उपन्यास का सुखांत अंत होता है।

परिचर्चा में वक्ताओं द्वारा कहा गया, रचित उपन्यास में प्रकृति का सुन्दर चित्रण किया गया है। उपन्यास का पठन-पाठन करने पर ऐसा लगता है, वैचारिक संबंध बना रहता है। प्रेमिका के विचार आधुनिक हैं लेकिन वह अपनी संस्कृति व परंपराओं से जुड़ी हुई है, जो सेतु का कार्य करती है। रचित उपन्यास दो देशों की यात्रा कराएगी, संस्कृति व परंपराओं का ज्ञान करायेगी।

रचित अस्सी पेज और बारह दृश्यों के नाटक ‘सुनता है कोई’ के बावत वक्ताओं द्वारा परिचर्चा में कहा गया, नाटक तीखे व्यंग के साथ लिखा गया है। व्यवस्थाओं और सरकारी तंत्र पर जितना लिखा जाए वह कम है। आम नागरिकों के बावत जो संवाद हैं, सोचने को मजबूर करते हैं। नाटक में अलग-अलग वर्गों को वर्गीकृत कर उनके जीवन पर प्रकाश डाला गया है।

नाटक वर्ष 1990 में प्रसारित टीवी सीरियल ऑफिस-ऑफिस की याद दिलाता है। आठवे दृश्य के बाद रचित नाटक में क्लाइमैक्श शुरू होता है। समाज की कुरीतियों को प्रभावी ढंग से रखा गया है। बेरोजगारी, आरक्षण, भू-माफिया, लोकतंत्र, गांधी- गोड़से, बुजुर्गों का मर्डर, एआई रील कल्चर, समाज कल्चर, जंगल कटाई इत्यादि इत्यादि का जिक्र रचित नाटक में है। नाटक में पिरोई गई भाषा सहज और आम बोलचाल की है, आंचलिक बोली-भाषा के शब्दों को बड़ी खूबी के साथ पिरोया गया है। संवाद बड़े-बड़े लिखे गए हैं। शैली यथार्थ वादी है। नाटक मंचन में करीब सवा दो घंटे का समय लगेगा।

परिचर्चा में वक्ताओं द्वारा कहा गया, डॉ. हरि सुमन बिष्ट के द्वारा रचित पूर्व के नाटकों में जो अंश छूट गए हैं उनके नए रचित नाटकों में छूटे अंश दिखाई देते हैं। नाटक में काव्यात्मक भाव बहुत हैं। डॉ. हरि सुमन बिष्ट लंबी रेश के घोड़े हैं।

परिचर्चा समापन पर डॉ. हरि सुमन बिष्ट द्वारा सभी मंचासीनों, वक्ताओं और सभाकक्ष में उपस्थित सभी प्रबुद्ध जनों की बड़ी संख्या में उपस्थिति के प्रति आभार व्यक्त किया गया।

रचित व लोकार्पित पुस्तकें बड़ी संख्या में पढ़ कर उन्हें आगे लिखने की प्रेरणा व बल देते रहने की बात कही गई। आयोजित पुस्तक लोकार्पण और परिचर्चा का प्रभावी मंच संचालन सुप्रसिद्ध एंकर एवं आरजे संजीव अग्निहोत्री द्वारा किया गया।http://Politicaltrust.in
