मन के जीते जीत, मन के हारे हार”
लेखक- जितेंद्र नारायण झा
New Delhi-मन बड़ा चंचल होता है। वह अक्सर आराम, लोभ, लालच, स्वार्थ, कामचोरी इत्यादि का रास्ता सबसे पहले दिखाता है और मेहनत से बचने और स्वार्थ का पीछा करने के बहाने खोजता है। शुरुआत में मन हमें आसान रास्तों की ओर आकर्षित करता है, क्योंकि उसे तत्काल सुख, सुविधा और आराम पसंद होता है।
लेकिन यदि मन को जीत लिया जाए, उसमें यह विश्वास स्थापित कर दिया जाए कि हमारी इंद्रियों से दिखाई देने वाली हर आकर्षक वस्तु अभी कुछ भी महत्व की नहीं है और ना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है, तो अपने अंदर विश्वास जगने लगता है और सोच बदलने लगती है।
जब मन यह स्वीकार कर लेता है कि “पहले स्वयं को योग्य बनाना है, फिर संसार की हर उपलब्धि अपने समय पर प्राप्त की जा सकती है,” तब इच्छाएं कमजोरी नहीं, बल्कि प्रेरणा बन जाती हैं।
मन को नियंत्रित करना ही सबसे बड़ी साधना है। एक बार मन साथी बन जाए, तो वही मन शक्ति, दिशा और सफलता का माध्यम बन जाता है।
फिर विजयश्री की माला आपके कदमों को चूमने लगती है, क्योंकि आपने सबसे कठिन युद्ध – अपने ही मन के साथ युद्ध जीत लिया होता है।
“मन के जीते जीत, मन के हारे हार।”
थोड़ा प्रयास करके देखिए, आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़कर देखिए
फिर समझ आएगा कि सही दिशा में चलने वाले व्यक्ति के लिए कुछ भी असंभव नहीं होता।
अपनी नजर में….
