बदलते सामाजिक समीकरण: अधिकारों के साथ जिम्मेदारी और संस्कार क्यों जरूरी हैं?
लेखक-जितेंद्र नारायण झा
New Delhi-आज सामाजिक संस्था, संस्कृति और परंपरा ,महिला सशक्तिकरण के नाम की राजनीति के बैसाखी पर टीका है और उपभोक्तावाद की बलि-बेदी पर चढ़ने को सजा है। क्रमिक विकास को जिस “लज्जा” के एहसास तले “जानवरपना” से मुक्ति मिली होगी, आज वही …. मर्यादा तोड़, उपभोक्तावाद और
आधुनिकता की अंधी दौड़ में तार-तार हो रहा है। जब रिश्तों की पवित्रता, परिवार की गरिमा….और
सामाजिक संतुलन को पीछे छोड़ हर भावना को बाजार और व्यक्तिगत इच्छा की कसौटी पर परखने लगे तो ,प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि विकास की यह दिशा हमें संवेदनशील मनुष्य बना रही है या केवल इच्छाओं के उपभोक्ता में बदल रही है ?स्वतंत्रता और अधिकारों के साथ यदि
जिम्मेदारी, संयम और संस्कार का संतुलन न रहे….तो सभ्यता की चमक के पीछे छिपा हुआ विघटन भी दिखाई देने लगता है (लिव -इन, यूनिकॉर्न इत्यादि जैसा)इसके पीछे क्या उसी ‘ जानवरपना’ के पुनरागमन का कोई…. इशारा या षड्यंत्र’ या दिखावा की परतें चढ़ीं
मां-बाप की उदासीनता ???
