भाजपा के बिहारी दांव से बंगाल में ममता की उड़ी नींद, ‘ओबीसी सोशल इंजीनियरिंग’ का सहारा  

 भाजपा के बिहारी दांव से बंगाल में ममता की उड़ी नींद, ‘ओबीसी सोशल इंजीनियरिंग’ का सहारा  
पटना। बिहार में सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही भाजपा ने पूर्वी भारत की राजनीति में बड़ा दांव चला है। इसका असर सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि पड़ोसी राज्य बंगाल की राजनीति में भी इसकी गूंज सुनाई देने लगी है। भाजपा अब बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए नई रणनीति के तहत काम कर रही है। पिछले 15 वर्षों से ममता बनर्जी के नेतृत्व में बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का दबदबा कायम है। इस मजबूत किले को भेदने के लिए भाजपा अब ‘ओबीसी सोशल इंजीनियरिंग’ का सहारा ले रही है। बिहार में सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो बंगाल के वोट बैंक को प्रभावित कर सकता है। सम्राट चौधरी कुशवाहा समुदाय से आते हैं, जो ओबीसी वर्ग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भाजपा को उम्मीद है कि उनका यह चेहरा बिहार के साथ-साथ बंगाल के सीमावर्ती जिलों जैसे मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण दिनाजपुर में भी असर डाल सकता है। इन इलाकों में ओबीसी और हिंदी भाषी मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या है, जिन्हें भाजपा अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही है। बंगाल की राजनीति में ओबीसी और एससी वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ममता बनर्जी का मजबूत आधार भी इसी सामाजिक समीकरण पर टिका हुआ है, जिसमें मुस्लिम वोट बैंक भी जुड़ा हुआ है। भाजपा की रणनीति इसी गठजोड़ में सेंध लगाने की है, ताकि चुनावी समीकरण बदले जा सकें।
सम्राट चौधरी की आक्रामक और स्पष्टवादी छवि भाजपा के लिए एक नया राजनीतिक हथियार बन सकती है। वे बिहार में खुद को एक मजबूत ओबीसी नेता के रूप में स्थापित कर चुके हैं। उनकी ‘पगड़ी राजनीति’ और कुशवाहा समाज के बीच बढ़ती लोकप्रियता ने उन्हें एक प्रभावशाली नेता बना दिया है। भाजपा इसी मॉडल को बंगाल में लागू करने की योजना बना रही है। हालांकि, बंगाल की राजनीति में क्षेत्रीय अस्मिता का मुद्दा हमेशा प्रमुख रहा है। ऐसे में बिहार के एक नेता का वहां कितना प्रभाव पड़ेगा, यह देखना अहम होगा। लेकिन भाजपा इसे एक प्रयोग के तौर पर देख रही है, जिसे ‘बिहार मॉडल’ के रूप में बंगाल में लागू किया जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का मुख्य लक्ष्य ममता बनर्जी के ओबीसी-मुस्लिम गठजोड़ को कमजोर करना है। यदि सम्राट चौधरी बिहार में विकास और सामाजिक प्रतिनिधित्व दोनों को संतुलित करते हैं, तो इसका असर बंगाल के चुनावों में भी देखने को मिल सकता है। यह सिर्फ एक राज्य का नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि पूर्वी भारत की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है, जहां ओबीसी राजनीति अब निर्णायक भूमिका निभाने की ओर बढ़ रही है।