संसद का सदस्य नहीं हूं,पर मेरी लिखी किताब संसद की सदस्य अवश्य हो गई- धनंजय गिरी
मेरी किताब अब संसद और सांसदों के बीच
New Delhi -मैं संसद की पुस्तकालय समिति का आभार व्यक्त करता हूं कि ‘इक्कीसवीं सदी के नवनीत:श्री गुरुजी ‘ जैसी किताब को अपनी सूची में शामिल करने के लिए।
संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी जो हमारे सांस्कृतिक हस्ताक्षर रहे हैं कि विचार -प्रक्रिया को लेकर सड़क से लेकर संसद में हंगामा होता रहा है। ऐसी परिस्थिति गुरुजी की वैचारिक स्थापनाओं की आंशिक समझ के कारण ही निर्मित हुई।
मेरा सौभाग्य है कि मैने गुरुजी पर शोध कार्य किया और डॉक्टरेट की उपाधि भी हासिल की। कालांतर में मैंने गुरुजी पर एक किताब भी लिखा जो प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक में गुरुजी से जुड़े संभव संदर्भों का चिन्हन और रेखांकन हुआ है जिस कारण पाठकों ने इस पुस्तक को अपार स्नेह और सम्मान दिया है।
अब संसद की लाइब्रेरी ने इस पुस्तक को अपनी सूची में शामिल किया है। संसद के गलियारे में अब गुरुजी की बातें इस पुस्तक के माध्यम से गूंजेगी। यह किताब जन प्रतिनिधियों की गुरुजी प्रति दृष्टि बदलेगी और राष्ट्र को देखने का एक नया दृष्टिकोण निर्मित करेगी।
