बजट में कम हो सकती है सोने-चांदी और मेटल्स पर ड्यूटी !
नई दिल्ली। बजट 2026 में सरकार से सोना-चांदी रिफाइनिंग सेक्टर के लिए ड्यूटी में बराबरी की मांग की जा रही है। मौजूदा ड्यूटी असमानता से घरेलू रिफाइनर्स को नुकसान हो रहा है और निवेश व क्षमता विस्तार प्रभावित हो रहा है।
देश के कीमती धातु (सोना-चांदी) रिफाइनिंग सेक्टर ने बजट 2026 से उम्मीदें लगाई हैं। देश की प्रमुख रिफाइनिंग कंपनी MMTC-PAMP ने सरकार से मांग की है कि घरेलू रिफाइनर्स और आयातित बुलियन (तैयार सोना-चांदी) के बीच ड्यूटी में बराबरी लाई जाए, ताकि भारतीय उद्योग को प्रतिस्पर्धा में नुकसान न झेलना पड़े। मौजूदा ड्यूटी स्ट्रक्चर घरेलू रिफाइनर्स के लिए चुनौती बन गया है।
MMTC-PAMP तक सीमित नहीं
रिफाइनिंग सेक्टर के अनुसार यह समस्या सिर्फ MMTC-PAMP तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा प्रेशियस मेटल रिफाइनिंग सेक्टर लंबे समय से ड्यूटी में असमानता का सामना कर रहा है। खासकर SEPA रूट के जरिए कच्चे सोने-चांदी (डोरे) के आयात और तैयार बुलियन के आयात पर लगने वाली ड्यूटी में अंतर घरेलू रिफाइनर्स को कमजोर स्थिति में डाल देता है। इसका असर यह होता है कि विदेशी कंपनियों से आने वाला तैयार बुलियन कई बार सस्ता पड़ता है, जिससे भारतीय रिफाइनर्स की प्रतिस्पर्धा क्षमता घटती है।
SEPA के बाद जिन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTA) पर हस्ताक्षर हुए हैं, उनमें बुलियन को कम ड्यूटी वाले दायरे से बाहर रखा गया है। इंडस्ट्री चाहती है कि आगे होने वाले समझौतों में भी सोना और चांदी को इस तरह की छूट न दी जाए, ताकि घरेलू उद्योग को संरक्षण मिल सके।
जानकारों का कहना है कि अगर भारत को रिफाइनिंग के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाना है और ज्यादा से ज्यादा LBMA (लंदन बुलियन मार्केट एसोसिएशन) मान्यता प्राप्त रिफाइनर्स तैयार करने हैं, तो सरकार को इनपुट से जुड़े लाभ देने होंगे। यह लाभ ड्यूटी डिफरेंशियल बढ़ाकर या नीति में बदलाव के जरिए दिया जा सकता है। इससे घरेलू कंपनियों को निवेश बढ़ाने, बेहतर रिटर्न पाने और अपनी तकनीकी क्षमता सुधारने का प्रोत्साहन मिलेगा।
