मानव-केंद्रित अर्थव्यवस्था ही सच्चे विकास का आधार : संजीत कुमार
New Delhi –भारत आज तीव्र आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। वैश्वीकरण, डिजिटलीकरण, स्टार्टअप संस्कृति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और औद्योगिक विस्तार ने देश के लिए विकास की नई संभावनाएँ खोली हैं। “विकसित भारत” का लक्ष्य केवल आर्थिक वृद्धि दर (GDP) तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय संतुलन और मानवीय गरिमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। गांधी स्मृति और दर्शन समिति के निदेशक संजीत कुमार का मानना है कि आज के समय में महात्मा गांधी का आर्थिक दृष्टिकोण हमें एक नैतिक दिशा प्रदान करता है-एक ऐसी मानव-केंद्रित अर्थव्यवस्था की, जिसमें विकास का केंद्र बिंदु मनुष्य हो, न कि केवल पूंजी।
संजीत कुमार के अनुसार गांधीजी का मानना था कि अर्थव्यवस्था का उद्देश्य संपत्ति का संकेंद्रण नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति-‘अंत्योदय’-का उत्थान होना चाहिए। उनका “ग्राम स्वराज” का विचार केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि आर्थिक स्वावलंबन की एक व्यापक अवधारणा भी था। गांव आत्मनिर्भर हों, स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा मिले और श्रम का सम्मान हो-यही गांधीजी के आर्थिक दर्शन का मूल था। आज जब देश “आत्मनिर्भर भारत” और “मेक इन इंडिया” जैसे अभियानों के माध्यम से स्वदेशी उत्पादन और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा दे रहा है, तो उसकी जड़ें कहीं न कहीं गांधीजी की सोच में दिखाई देती हैं।
गांधीजी ने ‘ट्रस्टीशिप’ का सिद्धांत भी दिया, जिसके अनुसार धनवान व्यक्ति समाज की संपत्ति के संरक्षक (ट्रस्टी) हैं। यह विचार आज के कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) की अवधारणा से काफी मेल खाता है। आज कंपनियों से अपेक्षा की जाती है कि वे केवल लाभ कमाने तक सीमित न रहें, बल्कि समाज और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभाएँ। यदि कॉर्पोरेट क्षेत्र ट्रस्टीशिप की भावना को आत्मसात करे, तो आर्थिक विकास अधिक समावेशी और संतुलित बन सकता है।
आधुनिक भारत में तीव्र शहरीकरण और उपभोक्तावाद ने जीवनशैली में व्यापक बदलाव किए हैं। लेकिन इसके साथ-साथ असमानता, बेरोजगारी और पर्यावरण संकट जैसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। गांधीजी ने सादगी, संयम और आवश्यकता-आधारित उपभोग का संदेश दिया था। उनका प्रसिद्ध कथन-“पृथ्वी प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकती है, परंतु किसी एक के लालच की नहीं”-आज के जलवायु संकट और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है।
संजीत कुमार बताते हैं कि गांधीजी श्रम की गरिमा के प्रबल समर्थक थे। चरखा उनके लिए केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और श्रम-सम्मान का प्रतीक था। आज जब भारत कौशल विकास, स्टार्टअप इंडिया, लोकल फॉर वोकल और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य कर रहा है, तो यह गांधीवादी दृष्टिकोण का ही आधुनिक रूप है। यदि विकास नीति में श्रमिकों की सुरक्षा, सामाजिक न्याय और कौशल संवर्धन को प्राथमिकता दी जाए, तो अर्थव्यवस्था अधिक मानवीय और संतुलित बन सकती है।
डिजिटल अर्थव्यवस्था के इस युग में भी गांधीजी की सोच अप्रासंगिक नहीं हुई है। तकनीक का उद्देश्य मानव जीवन को सरल और समृद्ध बनाना होना चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन के बढ़ते प्रभाव के बीच यह आवश्यक है कि नीति-निर्माता रोजगार सृजन और कौशल उन्नयन पर विशेष ध्यान दें। गांधीजी का संतुलित दृष्टिकोण हमें यही सिखाता है कि साधन और साध्य दोनों पवित्र होने चाहिए।
आज की विकास नीति में समावेशी वृद्धि पर विशेष जोर दिया जा रहा है। वित्तीय समावेशन, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण उद्यमिता और सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। यदि इन पहलों को गांधीजी के नैतिक मूल्यों-सत्य, अहिंसा और सेवा-के साथ जोड़ा जाए, तो विकास अधिक स्थायी और न्यायपूर्ण हो सकता है।
अंततः, मानव-केंद्रित अर्थव्यवस्था का अर्थ है-ऐसी व्यवस्था जिसमें व्यक्ति की गरिमा सर्वोपरि हो, संसाधनों का न्यायसंगत वितरण हो और विकास प्रकृति के साथ संतुलन में हो। गांधीजी का आर्थिक दर्शन हमें यह याद दिलाता है कि विकास केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी भी है।
आज जब भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का संकल्प लेकर तेजी से आगे बढ़ रहा है, तब यह आवश्यक है कि आर्थिक प्रगति को मानवीय मूल्यों से जोड़ा जाए। गांधीजी के विचार हमें यह सिखाते हैं कि सच्चा विकास वही है, जिसमें समाज का अंतिम व्यक्ति भी सम्मान और अवसर के साथ आगे बढ़ सके। यही मानव-केंद्रित अर्थव्यवस्था का सार है और यही आधुनिक भारत की वास्तविक शक्ति भी।
