हिमालयन बेल्ट में आया भूकंप प्रयागराज और कानपुर तक मचाएगा तबाही

 हिमालयन बेल्ट में आया भूकंप प्रयागराज और कानपुर तक मचाएगा तबाही
नई दिल्ली। तेजी से हो रहे निर्माण कार्यों में भूकंपरोधी नियमों की जरा सी चूक भारी नुकसान को न्यौता दे सकती है। अगर नियमों का पालन नहीं किया गया, तो हिमालयन बेल्ट में आया भूकंप कानपुर और प्रयागराज में भीषण तबाही ला सकता है। यह खुलासा आईआईटी कानपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर निहार रंजन पात्रा की रिपोर्ट में हुआ है। पिछले 17 वर्षों से देश के अलग अलग हिस्सों में ली गई मिट्टी और उसकी जांच रिपोर्ट के आधार पर उन्होंने अर्थक्वेक हैजर्ड मैप (भूकंप जोखिम मानचित्र) तैयार किया है। कानपुर शहर के करीब 43 स्थानों से मिट्टी निकाल कर जांच की गई है।
लैब में अध्ययन शुरू किया
इसमें पीडब्ल्यूडी ने भी सहयोग करते हुए कई जगहों की मिट्टी की प्रोफाइल प्रदान की थी। सीएसआईआर, डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी से मिले प्रोजेक्ट के बाद ही इसका अध्ययन शुरू किया। 2008 से गुजरात, हरियाणा, यूपी, बिहार के सभी शहरों की मिट्टी बोरहोल से प्राप्त की। और उसका लैब में अध्ययन शुरू किया। बाकी जगह तो 10 से 30 मीटर गहराई की मिट्टी लगी गई, लेकिन कानपुर और प्रयागराज में एक-एक जगह पर 80 मीटर की मिट्टी पर रिसर्च की गई। इसमें यह पता कानपुर और प्रयागराज और बनारस का कुछ हिस्सा है, जिसमें पाया कि लिक्विफेक्शन का खतरा अधिक है।
नुकसान की आशंका बढ़ जाती है
आमतौर पर भूकंप के दौरान आठ से 10 मीटर तक की गई गहराई में लिक्विफेक्शन का प्रभाव देखा जाता है। लेकिन कानपुर और प्रयागराज में यह असर 40 मीटर तक हो सकता है। कानपुर और प्रयागराज के कई हिस्सों में ज़मीन की ऊपरी परत लगभग 8 से 10 मीटर गहराई तक काफी ढीली, रेतीली और पानी से संतृप्त है। यही परत भूकंप के दौरान लिए सबसे ज्यादा संवेदनशील होती है। जमीन की 30 से 40 मीटर गहराई तक की परतें भूकंपीय तरंगों को सोखने के बजाय उन्हें ऊपर तक पहुंचा देती हैं। इसका असर यह होता है कि भूकंप के झटके कमजोर ऊपरी परतों तक पूरी ताकत के साथ पहुंचते हैं और नुकसान की आशंका बढ़ जाती है।