केले के रेशे से ‘लोकल टू ग्लोबल’ तक हथकरघे की नई उड़ान, राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2026 में दिखी भारत की समृद्ध विरासत
Political Trust Magazine
नई दिल्ली- भारत की समृद्ध हथकरघा परंपरा, बुनकरों की कलात्मक उत्कृष्टता और वस्त्र क्षेत्र में नवाचार को समर्पित राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह–2026 का आयोजन 7 अगस्त को नई दिल्ली स्थित संविधान क्लब ऑफ इंडिया, रफी मार्ग में भव्य रूप से किया गया। समारोह में केले के रेशे से बने पर्यावरण-अनुकूल वस्त्र विशेष आकर्षण का केंद्र रहे, वहीं हथकरघा क्षेत्र को आधुनिक तकनीक, नवाचार और वैश्विक बाजार से जोड़ने पर गहन चर्चा हुई।
इस आयोजन का उद्देश्य भारत की गौरवशाली हथकरघा विरासत के संरक्षण और संवर्धन के साथ-साथ बुनकरों, वस्त्र प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों, उद्यमियों, निर्यातकों, शोधकर्ताओं और नवाचारकर्ताओं को एक साझा मंच प्रदान करना था, ताकि इस क्षेत्र में रोजगार, सतत विकास और नए बाजार अवसरों की संभावनाओं को मजबूत किया जा सके।
कार्यक्रम में डॉ. वेणुगोपाल चारी, पूर्व केंद्रीय मंत्री, भारत सरकार, तथा श्री पी. नरहरि, आईएएस, संयुक्त सचिव, ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार सहित कई प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों ने भाग लिया। इस अवसर पर श्री राजीव जैन, पूर्व CEO, वस्त्र मंत्रालय; डॉ. सुरेंद्र कुमार, पूर्व निदेशक, वस्त्र मंत्रालय; श्री भास्कर, पूर्व अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक; डॉ. एस. आदिनारायण, संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष, अदीलीला फाउंडेशन; डॉ. वेंकट रेड्डी एवं डॉ. सी. भार्गवी, संस्थापक, बनानाज यार्न एंड फैब्रिक्स प्राइवेट लिमिटेड; श्री बैरी रेड्डी, संस्थापक एवं अध्यक्ष, बौद्ध मार्ग लाइवलीहुड फाउंडेशन; तथा श्री प्रवीण कुमार, CFO, रिटेलस्पार्क सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

अपने विशेष संबोधन में श्री पी. नरहरि, आईएएस ने बुनकरों, किसानों और ग्रामीण उत्पादकों के सामने मौजूद चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि सीमित बाजार पहुंच, पर्याप्त मूल्य संवर्धन का अभाव, बदलती उपभोक्ता प्राथमिकताएं, तकनीकी आवश्यकताएं और टिकाऊ रोजगार के अवसर आज इस क्षेत्र के सामने प्रमुख चुनौतियां हैं।

उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों का समाधान तकनीक, कौशल विकास, मजबूत बाजार संपर्क, नवाचार, उद्यमिता तथा सरकार, उद्योग और ग्रामीण समुदायों के बीच बेहतर सहयोग से किया जा सकता है। उन्होंने केले के रेशे से बने वस्त्रों को कृषि संसाधनों के मूल्य संवर्धन और नए आजीविका अवसरों का अभिनव उदाहरण बताया।

उन्होंने कहा कि भारतीय हथकरघा का भविष्य हमारी पारंपरिक विरासत को आधुनिक तकनीक, अनुसंधान, नवाचार और वैश्विक बाजार के अवसरों से जोड़ने में निहित है। हर हथकरघा उत्पाद केवल एक बुनकर की कला का नमूना नहीं, बल्कि उसके परिवार, संस्कृति, परंपरा और आकांक्षाओं की कहानी भी है। उन्होंने ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने, किसानों की आय बढ़ाने और महिलाओं एवं युवाओं के लिए नए रोजगार अवसर तैयार करने पर विशेष जोर दिया।

केले के रेशे से बने वस्त्रों ने खींचा सबका ध्यान
समारोह का सबसे बड़ा आकर्षण केले के पौधों से प्राप्त प्राकृतिक रेशे से विकसित वस्त्रों और उत्पादों की प्रदर्शनी रही। डॉ. वेंकट रेड्डी ने केले के रेशे पर अपने शोध, अध्ययन और नवाचारों की जानकारी देते हुए बताया कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से इस प्राकृतिक रेशे को उच्च गुणवत्ता वाले उपयोगी वस्त्र उत्पादों में बदला जा सकता है।
उन्होंने कहा कि केले का रेशा वस्त्र उद्योग के लिए एक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प बन सकता है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, किसानों की आय बढ़ेगी, कृषि संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।

हथकरघा क्षेत्र के योगदानकर्ताओं को मिला सम्मान
समारोह में उत्कृष्ट हथकरघा बुनकरों, वस्त्र प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों, उद्योग प्रतिनिधियों, निर्यातकों, उद्यमियों और क्षेत्र से जुड़े अन्य विशिष्ट व्यक्तित्वों को उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इस सम्मान का उद्देश्य भारतीय हथकरघा उद्योग के संरक्षण, नवाचार, तकनीकी उन्नयन, गुणवत्ता सुधार और रोजगार सृजन में योगदान देने वाले लोगों और संस्थाओं को प्रोत्साहित करना था।
वक्ताओं ने कहा कि भारत का हथकरघा क्षेत्र केवल वस्त्र उत्पादन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक ज्ञान, आत्मनिर्भरता और लाखों ग्रामीण परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। भारतीय हथकरघा की विशिष्ट कारीगरी, गुणवत्ता और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन पद्धतियां इसे वैश्विक बाजार में अलग पहचान दिलाने की क्षमता रखती हैं।

कार्यक्रम के दौरान सतत विकास, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला एवं युवा कौशल विकास, उद्यमिता, रोजगार सृजन, तकनीकी नवाचार और स्वदेशी उत्पादों के प्रचार-प्रसार जैसे विषयों पर भी व्यापक चर्चा हुई। आयोजन को आत्मनिर्भर भारत, वोकल फॉर लोकल, मेक इन इंडिया और लोकल से ग्लोबल के राष्ट्रीय दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने वाला प्रभावी मंच बताया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ वंदे मातरम्, दीप प्रज्वलन और गणेश वंदना के साथ हुआ, जबकि समापन राष्ट्रगान के साथ किया गया। पूरे आयोजन में भारतीय संस्कृति और देश की गौरवशाली हथकरघा विरासत की झलक देखने को मिली।
इस अवसर पर भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी, जनप्रतिनिधि, नीति-निर्माता, उद्योग प्रतिनिधि, हथकरघा एवं वस्त्र संगठनों से जुड़े लोग, निर्यातक, शिक्षाविद, शोधकर्ता, मीडिया प्रतिनिधि और सामाजिक संगठनों के सदस्य उपस्थित रहे।
अदीलीला फाउंडेशन के संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. एस. आदिनारायण ने कहा कि राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह–2026 केवल एक दिवस मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय बुनकरों को सम्मान देने, नई तकनीकों को अपनाने, महिलाओं और युवाओं के लिए अवसर सृजित करने, ग्रामीण आजीविका को मजबूत बनाने और भारतीय वस्त्रों को वैश्विक बाजार तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
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