“प्रतीक्षा, थकान और पुनर्सृजन के बीच समाज की कहानी

 “प्रतीक्षा, थकान और पुनर्सृजन के बीच समाज की कहानी

लेखक – जितेंद्र नारायण झा

एक संभावना…….
जब …..
कॉन्फिडेंस ज्ञान से बड़ा हो जाए,
और शिक्षा सतही “मिड” तक सिमटने लगे,
तब व्यवस्था ……. का
मनोविज्ञान भी बदलने लग सकता है।
ऐसी स्थिति में अधिकतर जीवन यदि बुज़ुर्गियत की ओर बढ़ते हुए
ऊपर की ओर टुकटुकी लगाए ……..
इंतज़ार करने लगे…..
तो यह सामूहिक थकान का संकेत भी हो सकता है।
और यदि बचा-खुचा यौवन
आँखें मूँदकर हताशा को निःश्वासों में बहाते चले……..
तो संभावना यह बन सकती है कि
ऊर्जा दिशा खोकर कमजोर पड़ने लगे…… और भीतर से जुड़ाव, उद्देश्य और विश्वास कम होता जाए।
ऐसे हालात में जीवन-यापन केवल “जीना” नहीं,
बल्कि “किसी तरह चलते रहना” बन सकता है।
काम आवश्यकता से होगा, प्रेरणा से कम।
संबंध औपचारिक होता चला जा सकता है,
और सपने…….. धीरे-धीरे व्यवहारिक
मजबूरियों के नीचे दब सकते हैं……..फिर
समाज में दो समानांतर दृश्य उभर सकते हैं—
प्रतीक्षा में जमी हुई अनुभवी आँखें….. या
उलझाव में बहता अधूरा यौवन।
कभी-कभी यही ठहराव भीतर प्रश्न भी जगा सकता है
कि केवल व्यवस्था बदलने से नहीं,
सोच, शिक्षा, संवाद और सामूहिक जिम्मेदारी के पुनर्निर्माण से भी रास्ते निकल सकते हैं।
छोटे-छोटे ईमानदार प्रयास,स्थानीय सहयोग,
वास्तविक कौशल,और पीढ़ियों के बीच संवाद धीरे-धीरे …… जड़ता को तोड़ना शुरू कर सकता है………….क्योंकि
जीवन केवल प्रतीक्षा नहीं है,
पुनर्सृजन की संभावना भी है।

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