जोरदार बहस के बीच लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक 2026 जरूरी दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण गिरा

 जोरदार बहस के बीच लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक 2026 जरूरी दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण गिरा
Political Trust Magazine 
नई दिल्ली। देश की राजनीति में शुक्रवार को देर शाम तक एक बड़ा घटनाक्रम चलता रहा। अंत में इसका नतीजा हुआ कि लोकसभा में महिला आरक्षण से संबंधित ‘131वां संविधान संशोधन विधेयक 2026’ जरूरी दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण गिर गया। सदन में दो दिनों तक चली तीखी बहस और गृहमंत्री अमित शाह के जवाब के बाद हुए मत विभाजन में विधेयक को पारित करने के लिए आवश्यक जादुई आंकड़ा नहीं मिल सका।
मत विभाजन और संवैधानिक अड़चन
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मत विभाजन के परिणामों की घोषणा करते हुए बताया कि विधेयक के समर्थन में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सदस्यों ने इसके विरोध में मतदान किया। संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार, किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण यह विधेयक शुरुआती स्तर पर ही गिर गया।
देर रात तक चली संसद
नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर दो दिन तक देर रात तक संसद में जोरदार बहस हुई। ओम बिरला ने महिला सांसदों की भागीदारी की तारीफ की।
विधेयक गिरने के तुरंत बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने घोषणा की कि सरकार अब ‘परिसीमन विधेयक 2026’ और ‘केंद्र शासित प्रदेश विधियां (संशोधन) विधेयक’ को आगे नहीं बढ़ाएगी। उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि महिला आरक्षण लागू करने का एक ऐतिहासिक अवसर विपक्ष के अड़ियल रुख के कारण हाथ से निकल गया है।
अमित शाह और राहुल गांधी के बीच बहस
चर्चा के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस और इंडिया गठबंधन पर ‘सुनियोजित षड्यंत्र’ रचने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विपक्ष नहीं चाहता कि 2029 से पहले महिला आरक्षण लागू हो। शाह ने स्पष्ट किया कि संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता, फिर भी विपक्ष तुष्टिकरण के लिए मुस्लिम आरक्षण की मांग कर रहा है।
विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार पर पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा राजनीतिक लाभ के लिए परिसीमन का सहारा ले रही है। विपक्ष का तर्क था कि इस परिसीमन से उत्तर भारत की सीटें बढ़ेंगी और दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा, जो संघीय ढांचे के खिलाफ है।