केंद्र सरकार ने ‘महिला आरक्षण कानून’ को समय से पहले जमीन पर उतारने के लिए निर्णायक कदम उठाया
- दिल्ली राजनीति राष्ट्रीय
Political Trust
- April 3, 2026
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नई दिल्ली। भारतीय राजनीति और संसदीय इतिहास में बेहद चौंकाने वाला और बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। केंद्र सरकार ने ‘महिला आरक्षण कानून’ (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को समय से पहले जमीन पर उतारने के लिए निर्णायक कदम उठा लिया है। अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने वाले बजट सत्र को समाप्त करने के बजाय, 16 अप्रैल सुबह 11 बजे तक के लिए टाल दिया गया है। यानी संसद का यह विशेष हिस्सा अब 16 से 18 अप्रैल तक फिर से चलेगा।
क्यों बदला गया संसद का शेड्यूल?
राज्यसभा के उप-सभापति हरिवंश ने सदन की कार्यवाही को 16 अप्रैल तक स्थगित करने की घोषणा की। सूत्रों के मुताबिक, सरकार का पूरा फोकस अब उस कानूनी अड़चन को खत्म करना है, जो महिला आरक्षण और जनगणना/परिसीमन के बीच फंसी थी। 2023 में पास हुए कानून के मुताबिक, आरक्षण अगली जनगणना के बाद ही लागू हो सकता था, जिसमें वर्षों का समय लग सकता था। अब सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए संशोधन बिल ला सकती है। सूत्रों के अनुसार, सरकार चाहती है कि महिलाओं को उनके हक के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े। जनगणना और परिसीमन की तकनीकी अड़चनों को दूर करने के लिए यह सत्र मील का पत्थर साबित होगा।
इस सत्र का सबसे बड़ा आकर्षण लोकसभा सीटों का पुनर्गठन हो सकता है। चर्चा है कि सरकार सदन में सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव ला सकती है। सीटों का गणित की बात करें तो, यदि सीटें 816 होती हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि सीटों की संख्या में 50 फीसदी का इजाफा होगा। बढ़ी हुई सीटों के साथ एक-तिहाई आरक्षण के फार्मूले के तहत लगभग 273 सीटें सीधे महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी। अगर यह संशोधन पास होता है, तो 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले ही देश की संसद का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा और महिलाओं की भागीदारी ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच जाएगी।
अचानक लिए गए इस फैसले ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। जहां सत्ता पक्ष इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में क्रांतिकारी कदम बता रहा है, वहीं विपक्ष इस पर सरकार की अगली रणनीति को भांपने में जुटा है। 16 से 18 अप्रैल के बीच होने वाला यह तीन दिवसीय सत्र भारतीय लोकतंत्र की रूपरेखा बदल सकता है।
राज्यसभा के उप-सभापति हरिवंश ने सदन की कार्यवाही को 16 अप्रैल तक स्थगित करने की घोषणा की। सूत्रों के मुताबिक, सरकार का पूरा फोकस अब उस कानूनी अड़चन को खत्म करना है, जो महिला आरक्षण और जनगणना/परिसीमन के बीच फंसी थी। 2023 में पास हुए कानून के मुताबिक, आरक्षण अगली जनगणना के बाद ही लागू हो सकता था, जिसमें वर्षों का समय लग सकता था। अब सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए संशोधन बिल ला सकती है। सूत्रों के अनुसार, सरकार चाहती है कि महिलाओं को उनके हक के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े। जनगणना और परिसीमन की तकनीकी अड़चनों को दूर करने के लिए यह सत्र मील का पत्थर साबित होगा।
इस सत्र का सबसे बड़ा आकर्षण लोकसभा सीटों का पुनर्गठन हो सकता है। चर्चा है कि सरकार सदन में सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव ला सकती है। सीटों का गणित की बात करें तो, यदि सीटें 816 होती हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि सीटों की संख्या में 50 फीसदी का इजाफा होगा। बढ़ी हुई सीटों के साथ एक-तिहाई आरक्षण के फार्मूले के तहत लगभग 273 सीटें सीधे महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी। अगर यह संशोधन पास होता है, तो 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले ही देश की संसद का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा और महिलाओं की भागीदारी ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच जाएगी।
अचानक लिए गए इस फैसले ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। जहां सत्ता पक्ष इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में क्रांतिकारी कदम बता रहा है, वहीं विपक्ष इस पर सरकार की अगली रणनीति को भांपने में जुटा है। 16 से 18 अप्रैल के बीच होने वाला यह तीन दिवसीय सत्र भारतीय लोकतंत्र की रूपरेखा बदल सकता है।
