आईटीआई के नियमों में बदलाव, अब 150 घंटे की प्रैक्टिकल ट्रेनिंग जरूरी
नई दिल्ली। भारत सरकार के कौशल विकास और उद्यमशीलता मंत्रालय के तहत प्रशिक्षण महानिदेशालय ने देशभर के औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई ) के लिए एक बड़ा ऐतिहासिक बदलाव किया है। नए नियमों के अनुसार, अब क्राफ्ट्समैन ट्रेनिंग स्कीम के तहत पढ़ने वाले सभी ट्रेनीज़ को 150 घंटे की अनिवार्य ‘ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग’ या ग्रुप प्रोजेक्ट करना होगा।
केंद्रीय कौशल विकास और उद्यमशीलता राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जयन्त चौधरी ने इस महत्वपूर्ण सुधार पर बोलते हुए कहा कि सिर्फ क्लासरूम लर्निंग अब पर्याप्त नहीं है। असली वर्कप्लेस एक्सपोजर से छात्रों में प्रैक्टिकल स्किल्स और प्रोफेशनलिज्म आता है। हमारा मकसद सिर्फ सर्टिफिकेट बांटना नहीं, बल्कि युवाओं को इंडस्ट्री की जरूरतों के हिसाब से ‘जॉब-रेडी’ बनाना है। उन्होंने इसे “कुशल भारत-विकसित भारत” के विजन को मजबूती देने वाला कदम बताया। मंत्री जयन्त चौधरी मानते हैं कि सरकार का मकसद सिर्फ सर्टिफिकेट देना नहीं, बल्कि युवाओं को असली इंडस्ट्री की जरूरतों के अनुसार स्किल्ड बनाना है।
ट्रेनिंग घंटों में कटौती, प्रैक्टिकल पर जोर
नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए डीजीटी ने सालाना ट्रेनिंग के कुल समय को 1600 घंटे से घटाकर 1200 घंटे कर दिया है। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य छात्रों पर बोझ कम करना और उन्हें सीधे इंडस्ट्री के वातावरण से जोड़ना है। पुराने सिस्टम में छात्र केवल संस्थान की पुरानी मशीनों पर ट्रेनिंग लेते थे, लेकिन अब उन्हें आधुनिक औद्योगिक तकनीकों का सीधा अनुभव मिलेगा।
मूल्यांकन और प्रमाणन की नई प्रक्रिया
नए नियमों के तहत, ट्रेनिंग की पात्रता के लिए छात्र को कम से कम तीन महीने का बेसिक कोर्स पूरा करना होगा। ट्रेनिंग के दौरान छात्रों को एक ‘लॉगबुक’ मेंटेन करनी होगी, जिसमें उनके दैनिक कार्यों का विवरण होगा। अंतिम मूल्यांकन में इंडस्ट्री मेंटर की रिपोर्ट और मौखिक परीक्षा को आधार बनाया जाएगा। सफल छात्रों को ‘इंडस्ट्री-अप्रूव्ड सर्टिफिकेट’ दिया जाएगा, जो भविष्य में नौकरी पाने में मील का पत्थर साबित होगा। यह न केवल शिक्षा नीति में बदलाव को दर्शाता है, बल्कि छात्रों के भविष्य और भारतीय अर्थव्यवस्था के ‘कुशल भारत’ विजन के लिए भी एक बड़ा कदम है।
