बोतलबंद पानी में मिले कैसर के रसायन, मचा हड़कंप
- दिल्ली राष्ट्रीय स्वास्थ्य
Political Trust
- January 22, 2026
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नई दिल्ली। बोतलबंद पानी ब्रांडों में ऐसे रासायनिक तत्व पाए गए हैं, जो कैंसर पैदा करने में सक्षम हैंं। बोतलबंद पानी को पूरी तरह सुरक्षित मानना ठीक नहीं।
बोतलबंद पानी स्वास्थ्य और शुद्धता की गारंटी मानकर खरीदा जाता है, लेकिन नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इस धारणा पर सवाल खड़े किए हैं। एक शोध के मुताबिक, दुनिया के बड़े बोतलबंद पानी ब्रांडों में भी ऐसे रासायनिक तत्व पाए गए हैं, जो कैंसर जैसी घातक बीमारी पैदा कर सकते हैं।
बोतलबंद पानी की खपत पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ी है। इसे स्वच्छता और सुरक्षित पीने के पानी के विकल्प के तौर पर देखते हैं। अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी के रसायन और जैव-रसायन विभाग के शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया। शोध का उद्देश्य यह जानना था कि बोतलबंद पानी में केवल वे डीबीपीएस मौजूद हैं या नहीं, जिन पर नियम लागू हैं, या फिर ऐसे प्राथमिक और बिना-नियमबद्ध डीबीपीएस भी हैं, जिन्हें अब तक गंभीरता से नहीं परखा गया।
इसके लिए ब्रांडों वाले पानी का विश्लेषण किया गया और उनकी तुलना क्लोरामिनयुक्त नल के पानी से की गई। पानी को पीने योग्य बनाने के लिए क्लोरीन, क्लोरामाइन, क्लोरीन डाइऑक्साइड या ओजोन जैसे रसायनों से कीटाणुशोधन किया जाता है। यह प्रक्रिया पानी में मौजूद प्राकृतिक ऑर्गेनिक पदार्थों, ब्रोमाइड और आयोडाइड के साथ प्रतिक्रिया करके अनजाने में नए रासायनिक यौगिक बना देती है। इन्हें डाइसइंफेक्शन बाय-प्रोडक्ट्स यानी डीबीपीएस कहा जाता है। अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) और फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने कुछ डीबीपीएस के लिए सीमा तय की है, लेकिन अब तक 700 से अधिक डीबीपीएस की पहचान हो चुकी है, जिनमें कई अत्यधिक विषैले माने जाते हैं।
बोतलबंद पानी को सुरक्षित मानना उचित नहीं
बोतलबंद पानी को पूरी तरह सुरक्षित मान लेना सही नहीं होगा, लेकिन नल के पानी की तुलना में इसमें हानिकारक रसायन कम पाए जाते हैं। बदलती जीवनशैली और बढ़ती खपत के दौर में यह अध्ययन चेतावनी है कि शुद्ध पानी के दावों की वैज्ञानिक जांच और कड़े मानक समय की मांग हैं।
बोतलबंद पानी की खपत पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ी है। इसे स्वच्छता और सुरक्षित पीने के पानी के विकल्प के तौर पर देखते हैं। अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी के रसायन और जैव-रसायन विभाग के शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया। शोध का उद्देश्य यह जानना था कि बोतलबंद पानी में केवल वे डीबीपीएस मौजूद हैं या नहीं, जिन पर नियम लागू हैं, या फिर ऐसे प्राथमिक और बिना-नियमबद्ध डीबीपीएस भी हैं, जिन्हें अब तक गंभीरता से नहीं परखा गया।
इसके लिए ब्रांडों वाले पानी का विश्लेषण किया गया और उनकी तुलना क्लोरामिनयुक्त नल के पानी से की गई। पानी को पीने योग्य बनाने के लिए क्लोरीन, क्लोरामाइन, क्लोरीन डाइऑक्साइड या ओजोन जैसे रसायनों से कीटाणुशोधन किया जाता है। यह प्रक्रिया पानी में मौजूद प्राकृतिक ऑर्गेनिक पदार्थों, ब्रोमाइड और आयोडाइड के साथ प्रतिक्रिया करके अनजाने में नए रासायनिक यौगिक बना देती है। इन्हें डाइसइंफेक्शन बाय-प्रोडक्ट्स यानी डीबीपीएस कहा जाता है। अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) और फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने कुछ डीबीपीएस के लिए सीमा तय की है, लेकिन अब तक 700 से अधिक डीबीपीएस की पहचान हो चुकी है, जिनमें कई अत्यधिक विषैले माने जाते हैं।
बोतलबंद पानी को सुरक्षित मानना उचित नहीं
बोतलबंद पानी को पूरी तरह सुरक्षित मान लेना सही नहीं होगा, लेकिन नल के पानी की तुलना में इसमें हानिकारक रसायन कम पाए जाते हैं। बदलती जीवनशैली और बढ़ती खपत के दौर में यह अध्ययन चेतावनी है कि शुद्ध पानी के दावों की वैज्ञानिक जांच और कड़े मानक समय की मांग हैं।
