Tashkent Agreement: 60 साल पहले की वो ऐतिहासिक भूल! आज लाहौर तक होता भारत!

 Tashkent Agreement: 60 साल पहले की वो ऐतिहासिक भूल! आज लाहौर तक होता भारत!

नई दिल्ली। भारत-पाकिस्‍तान के बीच मुख्‍य रूप से तीन युद्ध हो चुके हैं। इसके अलावा ऑपरेशन सिंदूर और बालाकोट जैसी एयर स्‍ट्राइक भी की गई हैं। इनमें से साल 1965 में लड़ा गया युद्ध कई मायनों में महत्‍वपूर्ण है। तब पाकिस्‍तान के शासक अयूब खान ने ‘दिल्‍ली में डिनर’ करने की बात कही थी। इसके बाद उस समय देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्‍त्री ने आर्मी के जवानों से कहा था कि हमलोग कल का नाश्‍ता लाहौर में करेंगे। शास्‍त्री जी की यह बात काफी हद तक सही भी साबित हुई थी, पर एक समझौते से तस्‍वीर बदल गई, नहीं तो आज लाहौर भारत का हिस्‍सा होता हैं।

लाल बहादुर शास्‍त्री की बात सच्‍चाई के करीब पहुंच गई थी। यदि ताशकंद समझौता नहीं हुआ होता तो आज लाहौर पाकिस्‍तान नहीं, बल्कि भारत का हिस्‍सा होता। बता दें कि ताशकंद घोषणापत्र पर हस्‍ताक्षर के अगले दिन 11 जनवरी 1966 को शास्‍त्री जी का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था। इसके बाद पूरा देश शोक में डूब गया था।

दरअसल, भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 के युद्ध के बाद हुआ ताशकंद समझौता उपमहाद्वीप के इतिहास में शांति प्रयासों की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। यह समझौता 10 जनवरी 1966 को सोवियत संघ (अब रूस) की मध्यस्थता में ताशकंद (वर्तमान उज़्बेकिस्तान) में हुआ था। इसका उद्देश्य 1965 के युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच तनाव कम करना और रिश्तों को सामान्य दिशा में ले जाना था। भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 में कश्मीर मुद्दे को लेकर भीषण युद्ध हुआ। पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ के तहत जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ की कोशिश की थी, जिसके जवाब में भारत ने कड़ा सैन्य प्रतिरोध किया. सितंबर 1965 में दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने आ गईं। युद्ध कई मोर्चों पर लड़ा गया और दोनों पक्षों को भारी नुकसान हुआ। अंतरराष्ट्रीय दबाव और संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप के बाद 22 सितंबर 1965 को युद्धविराम लागू हुआ, लेकिन स्थायी शांति के लिए बातचीत जरूरी थी।

12 अगस्त 1965 की इस तस्‍वीर में कश्मीर में लड़ाई के दौरान पकड़े गए दो पाकिस्तानी आर्मी अफसरों (जिनकी पहचान आंखों पर पट्टी बांधकर और जंजीरों से जकड़कर की गई है) को एक भारतीय सैनिक ले जा रहा है। सितंबर 1965 में भारत और पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र द्वारा अनिवार्य युद्धविराम पर सहमत हुए, जिससे गतिरोध वाला युद्ध समाप्त हुआ था।

उस समय दुनिया शीत युद्ध के दौर से गुजर रही थी। अमेरिका और सोवियत संघ दोनों क्षेत्रीय स्थिरता चाहते थे। सोवियत संघ ने भारत और पाकिस्तान को बातचीत के लिए आमंत्रित किया। इसी पहल के तहत ताशकंद में शिखर वार्ता आयोजित की गई। भारत की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान की ओर से राष्ट्रपति अयूब खान वार्ता में शामिल हुए। सोवियत प्रधानमंत्री एलेक्सी कोसिगिन ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। भारत का मुख्य उद्देश्य सीमा पर शांति बहाल करना और आगे किसी बड़े युद्ध की आशंका को टालना था। प्रधानमंत्री शास्त्री का मानना था कि बातचीत के जरिए ही स्थायी समाधान निकल सकता है। वहीं, पाकिस्तान युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय दबाव से राहत चाहता था और अपनी अर्थव्यवस्था व सेना को संभालने के लिए शांति को जरूरी मान रहा था।